मोसाद: इजराइल की किलिंग मशीन

प्रधानमंत्री मोदी जुलाई 17 की शुरुआत में इजराइल के दौरे पर थे. दोनों देशों के बीच बहुत से करार और अच्छी दोस्ती की सबको दरकार है. पीएम मोदी का इजराइल जाना इतना बड़ा इवेंट था कि इजराइल ने इसके लिए सुरक्षा के बहुत ही कड़े इंतजाम किए हुए थे. सुरक्षा के लिए पुलिस के साथ-साथ खूफिया लोग भी मुस्तैद थे.
आज इन्हीं की बात करेंगे. यह इजराइल की सबसे बड़ी और दुनिया की सबसे कामयाब ख़ुफ़िया एजेंसियों में से एक ‘मोसाद’ के लोग थे, जिन्हें पीएम मोदी की इजरायल यात्रा की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गयी थी. मोसाद को इजराइल की ताकत कहा जाता है. तो आईये इस एजेंसी से जुड़े पहलुओं को जानते हैं:

सुरक्षा को नए आयाम देने के लिए हुआ था गठन

यूं तो इजराइल में पहले से ही ‘अमन’ और ‘शिन बेट’ नाम की ख़ुफ़िया एजेंसियां मौजूद थी, लेकिन इनके बीच तालमेल सही नहीं था. इसको देखते हुए 1949 में इजराइल के प्रधानमंत्री ‘डेव्हिड बेन-गुरियन’ ने इसे बनाने का सुझाव दिया. इस मुद्दे को लेकर इजराइल के सुरक्षा अध्यक्षों की मीटिंग हुई तो उन्हें यह बहुत पसंद आया. तय किया गया कि इजराइल एक ऐसी एजेंसी का गठन करेगा, जो ख़ुफ़िया रुप से देश की आंतरिक और बाहरी दोनों मामलों को देख सके.
इसके साथ ही इजराइल की मंशा थी कि उनकी खुफिया एजेंसी विश्व स्तर पर सबसे बेहतर हो. इसके लिए हर जरुरी पहलू पर बात की गई और 1949 में शुरु हो गया इसके गठन का काम. इस एजेंसी को नाम दिया गया ‘मोसाद’. 1951 तक इसे लगभग पूरी तरह से तैयार कर लिया गया.
यह किसी के दवाब में न रहे इसलिए इन्हें सीधे तौर पर इजराइली प्रधानमंत्री से जोड़ दिया गया. यह बात भी सुनिश्चित कर दी गई कि सिर्फ प्रधानमंत्री ही हैं, जो इन्हें कुछ भी करने के आदेश दे सकते हैं. इन्हें भी निर्देशित किया गया कि यह किसी भी तरह की खुफिया जानकारी किसी और से शेयर न करें.

कई जिम्मेदारियां हैं इनके जिम्मे

‘मोसाद’ को ऐसे ही इजराइल की जान नहीं कहा जाता है. इजराइल के दुनिया में बहुत से दुश्मन हैं. ऐसे में देश के बाहर के दुश्मनों से देश की सुरक्षा करना इनकी प्राथमिकता होता है. इसके अलावा यह आतंकवाद से लड़ते हैं. जरुरत पड़ने पर यह सर्जिकल स्ट्राइक करने से नहीं डरते. जिम्मेदारियों का बोझ इन पर इतना होता है कि यह हर पल मिशन में होते हैं.
पूरी दुनिया में इनका नेटवर्क फैला रहता है. दुश्मन के लिए यह ‘किलिंग मशीन’ के नाम से मशहूर है. इन्हें ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि जब भी यह किसी मिशन पर जाते हैं तो दुश्मन को पल भर में ख़त्म कर देते हैं. दुश्मन चाहे पांच हों या पचास इन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता. यह चुप-चाप बड़ी ही खामोशी से अपना काम करने में माहिर होते हैं.

‘ऑपरेशन थंडरबोल्ट‘ में देश का मान बढ़ाया

1976 के आसपास इजराइल का नागरिकों से भरा हुआ एक प्लेन हाईजैक कर लिया गया था. यह प्लेन पेरिस की लिए इजराइल से उड़ा था. प्लेन को हाईजैक करके उसे सीधा युगांडा के एक एयरपोर्ट पर उतारा गया था. इस घटना के पीछे कुछ आतंकी संगठनों का हाथ था. असली मामला तब बिगड़ा जब युगांडा के उस समय के तानाशाह ‘ईदी अमिन‘ ने उन आतंकियों को अपने देश में पनाह दे दी.
आतंकियों ने थोड़े ही समय में मांग रखी कि उन्हें इजराइल से अपने 40 साथियों की रिहाई चाहिए. इस हादसे के बाद तो जैसे पूरी दुनिया ही हिल चुकी थी. किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर क्या किया जाये? युगांडा उनके देशों से कई किलोमीटर दूर था. न तो वहां के बारे में कोई खास तौर पर कुछ जानता था न ही कोई जानकारी प्राप्त हो पा रही थी. आतंकियों की असली दुश्मनी इजराइल से थी, क्योंकि उन्होंने उनके 40 साथियों को कैद में रखा हुआ था. इजराइल से बदला लेने के लिए उन्होंने उन सभी लोगों को जाने दिया, जो इजराइल के नहीं थे. 94 इजराइली नागरिकों को आतंकियों ने अपनी कैद में बरकरार रखा. आतंकियों को लगा था कि वह इजराइल को डरा देंगे, लेकिन हुआ इसका उल्टा.
इजराइल ने एक प्लान बनाया. उन्होंने सोच लिया कि वह आतंकियों के आगे हार नहीं मानेंगे और उनको मुंहतोड़ जवाब देंगे. इजराइल का यह प्लान बहुत ही खतरनाक था. उन्हें 4000 किलोमीटर दूर युगांडा में इस काम को अंजाम देना था. उनके पास जगह की जानकारी और वक़्त दोनों की कमी थी. छोटी सी गलती भी मौत का कारण बन सकती थी, लेकिन इजराइल को मोसाद पर भरोसा था.
मोसाद के द्वारा जुटाई गई जानकारी के बलबूते पर एक प्लेन में 100 इजराइली कमांडो निकल पड़े इस खूनी मिशन पर. रात के समय जैसे ही इजराइली सेना युगांडा के एयरपोर्ट पर अपने प्लेनों के साथ पहुंची उन्होंने उसमें से एक काली गाड़ी निकाली, जो हु-ब-हू ‘ईदी अमिन’ की गाड़ी से मिलती थी. उन्होंने युगांडा की सेना को ऐसा प्रतीत कराया, जैसे वह काफिला ‘ईदी अमिन’ का है. इस चालाकी के कारण किसी ने भी उन्हें एयरपोर्ट में घुसने से नहीं रोका. थोड़े आगे तक इजराइली सैनिक गए, लेकिन उनका राज पता चल गया. असल में ‘ईदी अमिन’ ने अपनी काली गाड़ी बदल कर सफ़ेद गाड़ी ले ली थी.
जब तक युगांडा के सैनिक हरकत में आते इजराइली कमांडो ने उन पर हमला करके उन्हें मार दिया. आगे बढ़ते हुए उन्होंंने आतंकियों को मार गिराया. महज 90 मिनट के इस मिशन में उन्होंने दुश्मन को साफ कर दिया. इस मिशन में इजराइल का सिर्फ एक कमांडो मारा गया था. आतंकियों को मारते ही वह पल भर में अपने प्लेन के साथ इजराइल के लिए रवाना हो गए. इस मिशन के बाद इजराइल का नाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गया.

नारी शक्ति है ख़ास हथियार

इजराइल दुनिया की शायद इकलौती ऐसी ख़ुफ़िया एजेंसी होगी, जिसमें आधी कर्मचारी औरतें हैं. ‘मोसाद’ का मानना है कि कई बार जो काम लड़कियां कर सकती हैं वह आदमी नहीं कर सकते. माना जाता है कि मोसाद में 24 प्रतिशत लड़कियां ऊंचे पद पर हैं. मोसाद को इन लड़कियों पर बहुत भरोसा रहता है. माना जाता है कि वह अपने लक्ष्य से नहीं भटकती हैं.
बताते चलें कि 1987 में इजराइल के परमाणु प्लांट पर काम करने वाले एक व्यक्ति ने उसकी जानकारी को कुछ लोगों को बेच दी थी. वह कर्मचारी यह जानकारी साझा करने के बाद देश से बाहर भाग गया था. इस काम के लिए इजराइल अपने अच्छे एजेंट्स को भी भेज सकता था, लेकिन उन्होंने इसके लिए एक लड़की को चुना. वह लड़की उस कर्मचारी के पास गई और अपनी बातों में उसे फंसा लिया. उसके बाद उसने उसे बेहोशी की दवाई दी और अपने साथ वापस इजराइल लेकर आ गई. इससे पता चलता है की इजरायल अपने काम को पूरा करने के लिए कुछ भी कर सकता है.

कड़ी ट्रेनिंग के दौर से निकलते हैं ‘मोसाद’

विश्व प्रसिद्ध ‘मोसाद’ का हिस्सा बनना कोई आसान काम नहीं है. सिर्फ सबसे अच्छे और सबसे होशियार ही इसमें शामिल हो पाते हैं. इसकी ट्रेनिंग बहुत ही कठिन होती है. इन्हें न सिर्फ दिमाग बल्कि शारीरिक रूप से भी सबसे अच्छा बनना पड़ता है. इनकी ट्रेनिंग में कई तरह की चीजें शामिल होती हैं.
इन्हें लड़ने के अलग-अलग तरीके, जानकारी हासिल करना, दूसरे देशों में जाकर अपने काम को अंजाम देना, हथियारों की जानकारी, जान लेने के तरीके, सबूत को मिटाना और दूसरे देशों के जासूसों से खुद को बचाने के गुर सिखाए जाते हैं. थका देने वाली ट्रेनिंग के बाद सिर्फ कुछ ही लोग होते हैं, जो ‘मोसाद’ का हिस्सा बनने में सक्षम हो पाते हैं. एक बार जब यह ‘मोसाद’ से जुड़ जाते हैं तो इन्हें भेज दिया जाता है दूसरे देशों में अपने-अपने मिशन पर.
आज की इस दुनिया में ख़ुफ़िया एजेंसी का होना किसी भी देश के लिए बहुत जरूरी है. जब बात हो इजराइल जैसे किसी देश की तो उसमें तो मोसाद का होना बहुत जरूरी है ही. कहते हैं कि भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी ‘रॉ’ और मोसाद के बीच काफी अच्छे संबंध हैं. दोनों हर पल एक दूसरे की मदद को तैयार रहते हैं. जाहिर है, ऐसे समर्पित लोगों की टीम से ही यह देश सुरक्षित रहता है.

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